घाव
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| संजीव शाकिर |
मैं घाव हूं दिल का, छुओगे तो भरूंगा नहीं।
ये नीम हकीम ख़तरा-ए-जान, से डरूंगा नहीं।
क़त्ल करना हो मुझे, तो एक अश्क़ बहा देना।
वरना लाख बददुआओं से भी, मैं मरूंगा नहीं।।
इस जलती लौ के चारों ओर चल घूम ले अभी।
फेरे के वक़्त तेरे, ऐ ज़ालिमा, यूँ रहूँगा नहीं।।
पन्ने पलटे तो ग़ज़लों ने तेरी याद ताज़ा की।
तेरी पीठ पे लिखा मतला महफ़िल में पढूंगा नहीं।।
तू ठहर, मै चलता हूं, कि किसी की नज़र ना पड़े।
अब किसी ने कुछ कहा, तो क़सम से सहूंगा नहीं।।
संजीव शाकिर
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बहुत सुंदर और बहुत गहरा
ReplyDeleteसहृदय धन्यवाद्
Deleteअति सुन्दर प्रस्तुति कविराज जी
DeleteThank you sir
DeleteSuper
ReplyDelete🎊
DeleteWah
ReplyDelete🎊
DeleteAti sunder
ReplyDeleteWah bahut khoob 👌👌👌
ReplyDeleteWah,👏👏👏👏
ReplyDelete🙏
DeleteWah wah kya bat hai
ReplyDelete🎊
DeleteBahut khub...
ReplyDelete💐
DeleteShandaar
ReplyDelete🎊
Deleteअतिशय सुंदर
ReplyDelete🎉
Deleteअति सुन्दर प्रस्तुति कविराज जी
ReplyDeleteधन्यवाद
DeleteGjb sir
ReplyDeleteDil ko chhu liye
शुक्रिया 🙏
DeleteNice
ReplyDeleteबहुत ही उम्दा और हकीक़त
Deletebahut hi sundar likhe ho bhaiya ji😍😍🙏💐
ReplyDelete🎉🙏
Deleteबहुत ही सुंदर दिल के गहराईयों में उतरता है सर
ReplyDelete🎉🙏
Delete👍🙏
ReplyDeleteWaah bhai waah
ReplyDelete🙏
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