घाव


संजीव शाकिर

मैं घाव हूं दिल का, छुओगे तो भरूंगा नहीं।

ये नीम हकीम ख़तरा-ए-जान, से डरूंगा नहीं।


क़त्ल करना हो मुझे, तो एक अश्क़ बहा देना।

वरना लाख बददुआओं से भी, मैं मरूंगा नहीं।।


इस जलती लौ के चारों ओर चल घूम ले अभी।

फेरे के वक़्त तेरे, ऐ ज़ालिमा, यूँ रहूँगा नहीं।।


पन्ने पलटे तो ग़ज़लों ने तेरी याद ताज़ा की।

तेरी पीठ पे लिखा मतला महफ़िल में पढूंगा नहीं।।


तू ठहर, मै चलता हूं, कि किसी की नज़र ना पड़े।

अब किसी ने कुछ कहा, तो क़सम से सहूंगा नहीं।।


संजीव शाकिर

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Comments

  1. बहुत सुंदर और बहुत गहरा

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    1. सहृदय धन्यवाद्

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    2. अति सुन्दर प्रस्तुति कविराज जी

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  2. Wah bahut khoob 👌👌👌

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  3. Wah wah kya bat hai

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  4. अतिशय सुंदर

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  5. अति सुन्दर प्रस्तुति कविराज जी

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  6. Gjb sir
    Dil ko chhu liye

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  7. Replies
    1. बहुत ही उम्दा और हकीक़त

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  8. bahut hi sundar likhe ho bhaiya ji😍😍🙏💐

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  9. बहुत ही सुंदर दिल के गहराईयों में उतरता है सर

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