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घाव

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संजीव शाकिर मैं घाव हूं दिल का, छुओगे तो भरूंगा नहीं। ये नीम हकीम ख़तरा-ए-जान, से डरूंगा नहीं। क़त्ल करना हो मुझे, तो एक अश्क़ बहा देना। वरना लाख बददुआओं से भी, मैं मरूंगा नहीं।। इस जलती लौ के चारों ओर चल घूम ले अभी। फेरे के वक़्त तेरे, ऐ ज़ालिमा, यूँ रहूँगा नहीं।। पन्ने पलटे तो ग़ज़लों ने तेरी याद ताज़ा की। तेरी पीठ पे लिखा मतला महफ़िल में पढूंगा नहीं।। तू ठहर, मै चलता हूं, कि किसी की नज़र ना पड़े। अब किसी ने कुछ कहा, तो क़सम से सहूंगा नहीं।। संजीव शाकिर ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ Instagram   Sanjeev_Shaakir YouTube   Click Here 💕 Facebook Sanjeev Shaakir ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

फ़कीर

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संजीव शाकिर घूम लो तुम कहीं। मिलूंगा मैं यहीं।।  भस्म- भूमि की राह में रब की पनाह में राम नाम सत्य का उद्घोष करते हुए हड्डियों के आंच से हाथ तपते हुए अद्य हो या कल में प्राण के हर पल में मृत्यु की गोंद में स्वयं से विरोध में चल- चल के रुके  रुक- रुक के चले  विचलित या व्याकुल अशांत या आकुल घूम कर चारों धाम ले चुका मैं विश्राम  तर्जनी को फेरकर रटता रहूं राम- राम नीर की धार से लौह की मार से तप- तप के लौ में एक होगा सौ में चक्रवर्ती की चाह में न देखे कौन राह में ख़ौफ़ को मारकर निकला दहाड़ कर दुनिया को जीतने हर शै को लूटने आ गया सिकंदर छोड़ के मुकद्दर लकड़ियां जला कर आग घी मिला कर बैठा फ़कीर था दुनिया को बुलाकर कहता चीखते हुए हाथ खींचते हुए देख लो आंख से जलेगा राख से स्वर्ण से था जड़ा उसमें "मै" था बड़ा विश्व का विजेता सेज पर है लेटा धूं- धूं करके उड़ा सब यहीं है पड़ा गांठ सारे खुल गए पाप यहीं धुल गए भस्म में अकड़ नहीं कोई जकड़ नहीं घूम लो तुम कहीं। मिलूंगा मैं यहीं।। भस्म- भूमि की राह में रब की पनाह में राम नाम सत्य का उद्घोष करते हुए हड्डियों के आंच से हाथ तपते हुए संजीव ...

सैलरी

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सैलरी 27 को जब आंख खुली मोबाइल में ही सैलरी मिली। ग्रॉस था मेरा लाख के पार मेसेज में आए चंद हजार।। खुश हो लूं या दुख मैं तोलूँ  कैसे चलेगा इसमें संसार। चेहरे के इसी भाव को पढ़कर श्रीमती ने किया तंज प्रहार।। मैडम बोली प्रश्न चिन्हों में आ गया है क्या पगार ? कितना आया कितना आया जरा बताओ हमको भी यार।। देखूं- देखूं, मैं भी तो देखूं आया कितना है अबकी बार। अच्छा छोड़ो रहने भी दो दे दो मुझको बस बीस हजार।। ये राशन, तेल, दूध का कोटा स्कूल फीस और बिल ये मोटा। चुकता कर दूंगी एक बार में ताने- वाने, मुझसे नहीं होता।। और शाम को जानू जल्दी आना खायेंगे आज हम बाहर खाना। सज धज के निकलूंगी जब मैं आँखें फाड़ देखेगा ज़माना।। तभी अचानक बाई आई बोली कुछ दे दो हमें कमाई। रामू काका ने कुछ ऐसे देखा सबका हो जाए फिर मैं लेता।। मैने फिर से जब फोन उठाया टन- टन करके मैसेज आया। आंख खुली की खुली रही हाय! क्रेडिट कार्ड का इतना बकाया।। मैडम बोली उचको नहीं ज्यादा बिल आया है अबकी आधा। मालूम नहीं कुछ तुम्हे यहां हर तरफ बचाया, बचता जहां।। पंखे को बोली बिजली से डरो अपना बिल या खुद ही भरो। एसी की तुमको बात बताऊं बिन ऑन किए...

4 दिन की CL

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संजीव शाकिर श्री डी. डा. डाबेराव जो कि सेक्शन इंचार्ज थे CRM (लोन समीक्षा निगरानी) के। मन में घर जाने के लिए छुट्टी की लालसा लिए हुए अपने ओवरसीइंग एग्जीक्यूटिव श्री चीं. चां. पाटिल के केबिन को बाहर से देखते हुए यह समीकरण समझने का प्रयास कर रहे थे कि क्या ये सही वक्त है अंदर जाने का ? पाटिल साहब का मिजाज कुछ यूं था कि उनकी हंसी और गम दोनों में आप शरीक नहीं हो सकते थे। जब वह हंसते, तो आपको यह सोचना पड़ जाता कि मुझे भी हंसना था क्या ? उन्हें दुखी देखकर आप यह जरूर कहते, कि भला यह भी कोई उदास होने की बात है ? मगर पाटिल साहब तो पाटिल साहब ! डाबेराव सर ने जैसे ही केबिन का दरवाजा खोला पाटिल साहब कंप्यूटर चलाने में तल्लीन थे। माउस को तो उन्होंने ऐसे पकड़ रखा था कि जैसे छोड़ते ही भाग कर बिल में घुस जाएगा। SWL (जिसमें NPA होने वाले लोन का विवरण रहता है) की लिस्ट स्क्रॉल करने पर भी खत्म नहीं हो रही थी। मगर पाटिल साहब की उदारता तो देखिए कंप्यूटर से मुंह हटाते हुए तुरंत बोल पड़े डाबेराव जी, बोलिए कुछ काम है क्या ? डाबेराव सर हिचकिचाते हुए..... नहीं सर कुछ नहीं। मैं तो बस घर जाने की सोच रहा था। अगर च...

अनकही

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~अनकही~ तेरे चेहरे से, ये जो नूर निकलते हैं जैसे तीरगी-ए-शब में जुगनू जलते हैं हम भी, एक अजीब अदाकार, बन बैठे हैं हर शख़्स से अब, नए किरदार में मिलते हैं लड़खड़ाते हैं मिरे ये पांव, हर पल, हर पग पग-पग पर, लड़खड़ा के, ख़ुद ही सभलते हैं तेरी ख़्वाहिश ही ना थी, हमें कभी भी, मगर तेरे ख़्वाब में, हम यूं, करवटें बदलते हैं बेशक थे जान, हम भी कभी, पत्थर के सनम  ये तो आज है, की हम मोम सा पिघलते हैं ताउम्र सच बोलने की कसमें खाते थे, जो अब वही एक-दूसरे से झूठ बोलते हैं संजीव शाकिर ....................................................................✍️ INSTAGRAM- http://www.instagram.com/sanjeev_shaakir FACEBOOK-  http://www.facebook.com/sanjeevshaakir   YOUTUBE- https://youtu.be/vLT-KbE83os ....................................................................✍️

हक़ीक़त-ए-हाल

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~हक़ीक़त-ए-हाल~ यूं अजीब तरह से लोग बौखला रहे हैं अलविदा कहने में होंठ कपकपा रहे हैं जिंदा रहते जो ना मिले उनसे गिला नहीं गिला है जो मौत पर मजलिस लगा रहे हैं मेरी क़ब्र पर तुम नीम के पौधे लगाना रिश्ते- नातों की मिठास अब कड़वा रहे हैं दर्द सारा ज़ेहन का नदारद हो जाता गर वो कहते रुको जरा हम आ रहे हैं दवाइयां बेअसर हैं बगैर दुआओं के लेकिन अब तो फरिश्ते भी ख़ौफ़ खा रहे हैं सहारे की लाठियां सारी टूट चुकी हैं मगर सियासत की लाठियां बरसा रहे हैं खेल ख़ूब खेला खिलौना समझकर सबको अब अपने ही बेमौत मारे जा रहे हैं संजीव शाकिर ....................................................................✍️ INSTAGRAM- http://www.instagram.com/sanjeev_shaakir FACEBOOK-  http://www.facebook.com/sanjeevshaakir   YOUTUBE- https://youtu.be/vLT-KbE83os ....................................................................✍️

तो होली है !

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संजीव शाकिर सारी रंजिशें भूलकर गले लगाओ तो होली है यूं ही खिड़की पर देखकर मुस्कुराओ तो होली है रंग-ओ-गुलाल सा उड़ेंगे हमारे इश्क़ के क़सीदे 'मां' रहने पर भी शाम को घर आओ तो होली है यार-रिश्तेदार घर-परिवार हर जगह से फोन आए तुम किसी और नाम से घंटी बजाओ तो होली है रीमिक्स,पॉप पर बहुत थिरके होंगे पांव तुम्हारे अब जो फगुआ गाकर ठुमका लगाओ तो होली है बहुत चखी तुम्हारी जूठी बाइट मकाँ से दुकाँ तक अपने हाथ की बनी गुजिया खिलाओ तो होली है ग़ालिबन! सूरत-ए-हाल नहीं तुम्हारे बस में मगर ऐविं! इक-दूजे के रंग में रंग जाओ तो होली है दस्तरस में है शाक़िर तिरे फिर अलम की है बात क्या मैं नीर सा बहूं तुम नाव बन जाओ तो होली है संजीव शाकिर ....................................................................✍️ INSTAGRAM- http://www.instagram.com/sanjeev_shaakir FACEBOOK-  http://www.facebook.com/sanjeevshaakir   YOUTUBE- https://youtu.be/vLT-KbE83os ....................................................................✍️

इब्तिदा-ए-इश्क़

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इब्तिदा-ए-इश्क़ तुम्हारे दूर चले जाने से तुम्हें खोने का डर बना रहता है  क़रीब तुम बैठे भी रहो तो यक़ीनन मेरा घर बना रहता है तुझे ख़ौफ़ है किस बात का जान जब क़दम क़दम पर हूं साथ तेरे रख हौसला और फिर देख तू कैसे ये हसीं सफर बना रहता है महज़ बातों का मेरे ख़्याल छोड़ जरा जज्बातों पर भी गौर कर तक़लीफ़ो में भी जो साथ हो, बेशक वो हमसफ़र बना रहता है दरख़्तों की डालियां जो तुझे छांव देने के ख़ातिर हैं झुकी हुई वो मुस्कुरा लें कितना भी पर ग़ालिबन दर्द-ए-जिगर बना रहता है तू साथ है, मेरा अक्स बन कर और मेरे अश्कों में है घुली हुई हो हर्फ़ जुदाई की जैसे ही पलकों पर समंदर बना रहता है तेरे हुस्न पे मैं मायल हूं और तेरी सीरत का मैं कायल भी पिघलती मोम में भी जलने का, जलाने का हुनर बना रहता है पतझड़ ने जिन पेड़ों को उनकी पत्तियां लूट कर बेआबरू किया मौसम के करवट बदलते ही बसंत में वही शजर बना रहता है उन चार लोगों की है बिसात क्या?  यार! अब तेरे मेरे दरमियां जिनकी जुबां कितनी भी शक्कर हो पर दिल में ज़हर बना रहता है आ, तू पास आ, मिरे साथ चल, लिए हाथों में यूं ही हाथ मेरा तेरे जाने के बाद भी भीनी खुशबू क...

अंदाज़-ए-बयाँ

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अंदाज़-ए-बयाँ सब कुछ लगा कर दाँव पर, हम ऐसे चाल हार गए अब क्या बरछी क्या कटार, वो जुबां से ही मार गए जीतने की ख़्वाहिश तो थी ही नहीं, कभी भी उनसे रंजिशें ग़ैरों  से की  और  अपने  सारे  यार गए इक फर्क है  मेरे और उनके  अंदाज़-ए-बयाँ में वो अब भी  इक राज हैं, मेरे सारे असरार गए तूफानों ने लहरों से  मिल कर ऐसी साज़िश रची कश्ती तिरे ख़ैर में  ना जाने कितने  पतवार गए अमूमन, तमाम शब मैं  इसी क़ैफ़ियत में रहता हूं बेज़ार हो क्यों? मिरे किस बात पर इतना ख़ार गए तुम्हारा यूं  हौले से  रुख़सत हो जाना  जायज़ है तुम्हें  ख़बर भी है, यहां  मेरे कितने  इतवार गए ................................................................................................... संजीव शाकिर केनरा बैंक, छपरा ....................................................................✍️ INSTAGRAM- http://www.instagram.com/sanjeev_shaakir FACEBOOK-  http://www.facebook.com/sanjeevshaakir   YOUTUBE- https://youtu.be/vLT-KbE83os ..............

मरासिम

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संजीव शाकिर न जाने कैसा है दर्द उसे, न जाने कैसी कराह है ख़ामोश बेशक है वो मगर, ये कारी रात गवाह है तेरे बदन से नहीं, तेरी रूह से है, ताल्लुक़ मेरा हाँ,तड़पता मैं भी हूं,तेरी जब भी निकलती आह है बेचैन हो उठता है दिल,तू जब भी मुब्तिला हो कहीं सुकूँ मिलता है ग़ालिबन,मिलती जब भी तुझे पनाह है महफ़ूज़ रहें तेरे अपने,मुक़म्मल हो हर ख़्वाब तेरा बस इतनी सी इल्तिजा है मेरी,इतनी ही परवाह है सुनो,अब छोड़ो ये सब,आओ उठो,चलो घर चलते हैं  दीया चौखट पर रखे,"मां" बस तकती हमारी राह है

तो मोहब्बत है !

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तो मोहब्बत है ! जुबां को कहना पड़े फिर इश्क़ कैसा ? आंखों से बयां हो, तो मोहब्बत है ! ग़ुरबत में सजदे लाज़िमी हैं मगर  उसकी भी दुआ हो, तो मोहब्बत है ! दार के दरवाजों से लेकर दरीचों तक सब, खुले के खुले रहते हैं। उसके दर पे दस्तक देने से भी,  वो गर मुझसे जुदा हो, तो मोहब्बत है ! समंदर के थपेड़ों ने डुबोई हैं, ना जाने, कितनी ही कश्तियां, फिर भी अब किसी कश्ती का दिल  बलखाती लहरों पे ही फ़िदा हो, तो मोहब्बत है ! जमीन पर टूट कर बिखरते हैं शाख़ों से पत्ते, आंधियों के चलने से। मगर मुरझायी कलियाँ, जब हवा के झोंकों से जवां हो, तो मोहब्बत है ! मेरी तक़लीफों को भी, कोई तक़सीम करे मगर, यह मुमकिन ही कहां लिए फिरते हैं, हंसी होंठो पे जो,  दिल उनका दुखा हो, तो मोहब्बत है ! संजीव शाकिर ....................................................................✍️ INSTAGRAM- http://www.instagram.com/sanjeev_shaakir FACEBOOK-  http://www.facebook.com/sanjeevshaakir   YOUTUBE- https://youtu.be/vLT-KbE83os ....................................................................✍️

रक़ीब

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उससे मिलने को तो, वो, उसके घर जाती है मैं, गली से भी जो गुज़रू, तो मुक़र जाती है कुछ तो बेहतर होगा, यक़ीनन उसमें, मुझसे मैं तुझ पर मरता हूँ, तू, उसपे मर जाती है ख़्वाब में भी कभी उसे, यूं, बेरिदा नहीं किया है नज़ाकत तेरी, जो, दिल में, उतर जाती है मेरी,  तक़दीर में,  लिखा है,  राएगाँ होना पर "आह" जो निकले तिरी, आंखे भर जाती हैं तू चाहे मुक़र्रर कर, कोई भी ताज़ीर, मुझे   मेरे हम्द में, हर बार तू, सज-संवर जाती है तुझे अब और जानने की, ख्वाहिश ही नहीं है भुलाऊं कैसे, इस ख़ौफ़ से, रूह डर जाती है मेरे जनाजे के सफ़र से, है, क्या फ़रक उसे जैसे वक़्त गुज़रता है, वो भी, गुज़र जाती है यूं छोड़ कर उसे, वापस आने से पहले, मैं खड़ा रहता हूं वहीं, जहां तक, नज़र जाती है किसी ग़ैर से गुफ़्तगू तिरी, जो देख ले शाकिर रात की चढ़ी, एक झटके में, उतर जाती है  ................................................................................ बेरिदा = घूंघट के बिना राएगाँ = बर्बाद ताज़ीर = सज़ा हम्द = ख़ुदा की तारीफ मुकर्रर करना = तय कर देना, सुना देना . .........................................................