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संजीव शाकिर
सूरज के जगने से पहलेउसकी आंखे खुल जाती हैं,क़दम पड़े जो धरा पर उसकेघड़ी की सुइयाँ हिल जाती हैं।
एहसास कराती हर टिक-टिक परआख़िर, कैसी ज़िम्मेदारी है,चूल्हे की आग में हर दिन तपनाउल्लास नहीं, लाचारी है।
घर की चौखट पर घूँघट काढ़ेअपनों की राह वो तकती है,है दर्द बहुत घुटनों में उसकेपर कभी नहीं वह थकती है।
सबने तो देखा है मोह तेरातेरा रोष कहाँ किसने देखा,रावण भी थर-थर काँपेगा यदिखींचे स्वयं, तू लक्ष्मण रेखा।
पूजा थाली को ढाल बनाकरआरती की लौ मशाल बना,मजबूरी की ज़ंजीरें पिघलाकरलक्ष्मीबाई की तलवार बना।
पुरुष का पौरुष, भ्रम है केवलताक़त जिसको वह कहता है,स्वयं संरक्षण पाने की ख़ातिरतेरी कोख में ख़ुद वो रहता है।
तू नज़र झुकाए बैठी हैजब है प्रथम अधिकार तेरा,अरे आंख मिला के कह दे जग सेपूरा है, यह संसार तेरा।
होगा माई का लाल कोईवह लाल भी है एक लाल तेरा,बाँध ले पूरी दुनिया आँचल मेंऐसा अद्भुत किरदार तेरा।
संजीव शाकिर
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Bahut Hi Sundar Sanjeev Ji ..
ReplyDeleteBahut Hi Sundar Sanjeev Ji ..
ReplyDelete🙏
DeleteSpecial on women's day..
ReplyDeleteThanks
DeleteNice bhai ji
ReplyDeleteVery nice bhai
ReplyDelete🙏
DeleteBahut hi sunder 🙏🏻
ReplyDelete🙏
DeleteBahut hi jabardast
ReplyDelete🙏
DeleteAwesome lines
ReplyDeleteBhut sundar
ReplyDeletevery nice bhai Ji keep it up 👍
ReplyDeleteThanks
DeletePoem is with reality. Very nice
ReplyDeleteशुक्रिया
Deleteवाह 👍
ReplyDelete🙏
Deleteबहुत सुंदर प्रस्तुति कवि संजीव भाई
ReplyDeleteदिल से शुक्रिया
DeleteAwesome
ReplyDelete🙏
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