फ़कीर
घूम लो तुम कहीं।
मिलूंगा मैं यहीं।।
भस्म- भूमि की राह में
रब की पनाह में
राम नाम सत्य का
उद्घोष करते हुए
हड्डियों के आंच से
हाथ तपते हुए
अद्य हो या कल में
प्राण के हर पल में
मृत्यु की गोंद में
स्वयं से विरोध में
चल- चल के रुके
रुक- रुक के चले
विचलित या व्याकुल
अशांत या आकुल
घूम कर चारों धाम
ले चुका मैं विश्राम
तर्जनी को फेरकर
रटता रहूं राम- राम
नीर की धार से
लौह की मार से
तप- तप के लौ में
एक होगा सौ में
चक्रवर्ती की चाह में
न देखे कौन राह में
ख़ौफ़ को मारकर
निकला दहाड़ कर
दुनिया को जीतने
हर शै को लूटने
आ गया सिकंदर
छोड़ के मुकद्दर
लकड़ियां जला कर
आग घी मिला कर
बैठा फ़कीर था
दुनिया को बुलाकर
कहता चीखते हुए
हाथ खींचते हुए
देख लो आंख से
जलेगा राख से
स्वर्ण से था जड़ा
उसमें "मै" था बड़ा
विश्व का विजेता
सेज पर है लेटा
धूं- धूं करके उड़ा
सब यहीं है पड़ा
गांठ सारे खुल गए
पाप यहीं धुल गए
भस्म में अकड़ नहीं
कोई जकड़ नहीं
घूम लो तुम कहीं।
मिलूंगा मैं यहीं।।
भस्म- भूमि की राह में
रब की पनाह में
राम नाम सत्य का
उद्घोष करते हुए
हड्डियों के आंच से
हाथ तपते हुए
संजीव शाकिर
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Good line sir ji 🙏
ReplyDelete🙏
DeleteBahut Badhiya 👏
ReplyDeleteNice
ReplyDeletebahut sundar ❤️💐
ReplyDeleteSuper 👌👌👌👌👌
ReplyDeleteBeautiful lines
ReplyDelete🙏
Deleteबहुत खूब.. शाकिर साहब....👏👏🙏
ReplyDeleteदुआ है भाई
DeleteBahut badhiya 🙏
ReplyDelete🙏
Deleteबहुत सुन्दर 👍🏻🙏🏻
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