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संजीव शाकिर सूरज के जगने से पहले उसकी आंखे खुल जाती हैं, क़दम पड़े जो धरा पर उसके घड़ी की सुइयाँ हिल जाती हैं। एहसास कराती हर टिक-टिक पर आख़िर, कैसी ज़िम्मेदारी है, चूल्हे की आग में हर दिन तपना उल्लास नहीं, लाचारी है। घर की चौखट पर घूँघट काढ़े अपनों की राह वो तकती है, है दर्द बहुत घुटनों में उसके पर कभी नहीं वह थकती है। सबने तो देखा है मोह तेरा तेरा रोष कहाँ किसने देखा, रावण भी थर-थर काँपेगा यदि खींचे स्वयं, तू लक्ष्मण रेखा। पूजा थाली को ढाल बनाकर आरती की लौ मशाल बना, मजबूरी की ज़ंजीरें पिघलाकर लक्ष्मीबाई की तलवार बना। पुरुष का पौरुष, भ्रम है केवल ताक़त जिसको वह कहता है, स्वयं संरक्षण पाने की ख़ातिर तेरी कोख में ख़ुद वो रहता है। तू नज़र झुकाए बैठी है जब है प्रथम अधिकार तेरा, अरे आंख मिला के कह दे जग से पूरा है, यह संसार तेरा। होगा माई का लाल कोई वह लाल भी है एक लाल तेरा, बाँध ले पूरी दुनिया आँचल में ऐसा अद्भुत किरदार तेरा। संजीव शाकिर ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ Instagram Sanjeev_Shaakir YouTube Click Here 💕 Facebook Sanjeev Shaakir ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~...