4 दिन की CL
संजीव शाकिर श्री डी. डा. डाबेराव जो कि सेक्शन इंचार्ज थे CRM (लोन समीक्षा निगरानी) के। मन में घर जाने के लिए छुट्टी की लालसा लिए हुए अपने ओवरसीइंग एग्जीक्यूटिव श्री चीं. चां. पाटिल के केबिन को बाहर से देखते हुए यह समीकरण समझने का प्रयास कर रहे थे कि क्या ये सही वक्त है अंदर जाने का ? पाटिल साहब का मिजाज कुछ यूं था कि उनकी हंसी और गम दोनों में आप शरीक नहीं हो सकते थे। जब वह हंसते, तो आपको यह सोचना पड़ जाता कि मुझे भी हंसना था क्या ? उन्हें दुखी देखकर आप यह जरूर कहते, कि भला यह भी कोई उदास होने की बात है ? मगर पाटिल साहब तो पाटिल साहब ! डाबेराव सर ने जैसे ही केबिन का दरवाजा खोला पाटिल साहब कंप्यूटर चलाने में तल्लीन थे। माउस को तो उन्होंने ऐसे पकड़ रखा था कि जैसे छोड़ते ही भाग कर बिल में घुस जाएगा। SWL (जिसमें NPA होने वाले लोन का विवरण रहता है) की लिस्ट स्क्रॉल करने पर भी खत्म नहीं हो रही थी। मगर पाटिल साहब की उदारता तो देखिए कंप्यूटर से मुंह हटाते हुए तुरंत बोल पड़े डाबेराव जी, बोलिए कुछ काम है क्या ? डाबेराव सर हिचकिचाते हुए..... नहीं सर कुछ नहीं। मैं तो बस घर जाने की सोच रहा था। अगर च...